मुख कैंसर

मुख शरीर का आइना है अर्थात् शरीर में होने वाली ज्यादातर बीमारियों के लक्षण मुख गुहा में देखे जा सकते हैं। मुख व मुख गुहा मानव शरीर का अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है जिसकी बीमारी की स्थिति में सम्पूर्ण शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव होता हैं। यहाँ पर मुख व मुख गुहा का सन्दर्भ इसमें पाये जाने वाले समस्त ढाँचों जैसे-गाल, होठ, जीभ, तालू, मुँह का निचला भाग, मसूढ़े इत्यादि से हैं। मुख कैंसर  उपरोक्त किसी एक या अनेक में भी हो सकता हैं।

मुख कैंसर के कारण

बाह्य कारकः तम्बाकू, गुटखा, पान, सुपाड़ी, हुक्का शराब, तम्बाकू युक्त दन्तमंजन, खैनी.

अन्तः कारकः बढ़ती उम्र, आनुवांशिकी, भौतिक, रासायनिक,हॉर्मोन, वायरस तथा दाँत, अंग प्रत्यारोपण.

तम्बाकूः जानलेवा शब्द  अटपटा जरूर प्रतीत हो रहा होगा परन्तु सत्य यही है और आम जनमानस को यह भली-भाँति समझ लेना होगा। कि तम्बाकू का सेवन सदैव हानिकारक होता है। चूने के साथ तम्बाकू का सेवन करने वाले व्यक्तियों को पायरिया एवं मसूढ़ों तथा परिदन्तीय ढाँचों के रोग होने की सम्भावना कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे लोगों में अगर दाँत में सड़न है तो वह भी चूने व तम्बाकू के प्रबाव के कारण दर्द रहित हो जाता है। जिसकी वजह से मरीज का ध्यान उस पर नहीं जाता है। और वह दाँत  और अधिक सड़ जाता हैं।

तम्बाकू एवं सम्बन्धित उत्पादों में कैंसर के विभिन्न कारक रासायनिक रूप में होते हैं जिनमें प्रमुख रूप से निकोटिन, नाइट्रोसोप्रोलीन इत्यादि। इसी प्रकार धुएँ युक्त तम्बाकू उत्पाद जैसे कि बीड़ी, सिगरेट आदि में कार्बनमोनोऑक्साइड, थायोसाईनेट, हाइड्रोजनस साइनाइड, निकोटिन, एवं इनके उत्पाद होते हैं।

धुँआ युक्त तम्बाकू जैसे सिगरेट, बीड़ी आदि का सेवन ज्यादा हानिकारक होता है परन्तु धुआँ रहित तम्बाकू जैसे कि खैनी-सुर्ती आदि भी बेहद खतरनाक होती है क्योंकि इनका प्रोयग ज्यादा होता है एवं कम उम्र वाले भी बहुत करते हैं।

हुक्काः हुक्के के द्वारा तम्बाकू का सेवन करने से खतरा और भी बढ़ जाता है। इससे न सिर्फ कैंसर होने सम्भावना प्रबल हो जाती है। एक ओर जहाँ सिगरेट में छनने के माध्यम से धुआँ छनकर शरीर में पहुँचता है वहीं हुक्का व चिलम इत्यादि से निकलने वाला धुआँ सीधे शरीर में पहुँचकर अधिक नुकसान करता है।

शोध के माध्यम से यह निष्कर्ष भी निकला है कि हुक्के में प्रयोग होने वाला पानी जब वाष्पीकृत होकर धुआँ शरीर के अन्दर जाता है तो बेहद नुकसानदायक साबित होता हैं।

पान-सुपाड़ीः इसमें भी एरोकोलीन कई अन्य खतरनाक रसायन होते है जो गाल, होठ, जीभ, मसूढ़ों  एवं तालू इत्यादि पर प्रतिकूल असर डालते हैं। लम्बी अवधि तक पान-सुपाड़ी का सेवन करने से दाँतों पर  भी हानिकारक प्रभावा पड़ता है जिसकी वजह से मुँह का खुलना भी कम हो जाता है। तथा ऐसी परिस्थिति को कैंसर पूर्व अवस्था ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस कहा जाता है। पान के साथ प्रयोग होने वाली सुपाड़ी कैंसर की सम्भावना को और बढ़ा देती हैं।

गुटखाः गुटखे में प्रयोग होने वाली सुपाड़ी के हानिकारक व खतरनाक दुष्प्रभाव का असर मुँह तक ही सीमित नहीं रहता अपितु शरीर के अन्य हिस्सों पर भी इसका दुष्प्रभाव होता हैं।

शराबः शोध के अनुसार शराब व मदिरा का सभी रूप में सेवन मुख कैंसर का मुख्य कारण माना गया हैं। शराब के साथ तम्बाकू (धूम्रपान) का सेवन करने से कैंसर होने की सम्भावना कई गुना बढ़ जाती हैं। ऐसा माना जाता हैं। कि दोनों का हानिकारक प्रभाव जुड़कर असर करता हैं। अर्थात इनका अलग-अलग जितना असर होता हैं दोनों का इस्तेमाल करने पर असर चार गुना हो जाता हैं।

अन्तः कारकः

बढ़ती उम्रः मुख कैंसर का उम्र से सम्बन्ध यह भी दर्शाता है कि कहीं न कहीं यह बीमारी लम्बे समय तक कारक के रहने के कारण होती हैं। आयु बढ़ने के साथ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है जिसकी वजह से कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती हैं।

आनुवांशिकीः वांशिकी बदलाव को भी बढ़ती उम्र के साथ मुख कैंसर में अहम भूमिका निभाने का कारण माना गया हैं। ऐसा माना गया है कि जीन्स में होने वाली अप्रत्याशित बदलाव के कारण कोशिकाओं का विभाजन अनियंत्रित हो जाता है जिससे ट्यूमर बन जाता है।

भौतिक, रासायनिक, हॉर्मोन तथा दाँत द्वारा लगातार रगड़ होने के कारण भी कोशिकाओं में बदलाव देखने को मिला हैं।

अंग प्रत्यारोपणः ऐसे मरीजों में लम्बी अवधि तक देख-रेख के दौरान ऐसा पाया गया हैं। कि उनमें भी प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती हैं।

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